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Sunday, November 1, 2015

. . . तो हो जाएंगे भाव कम !

वर्तमान में खाद्यान्न की निरन्तर बढ़ती किमतों को लेकर परेशान वही लोग है जो पूर्व में कृषि भूमि बेच चुके या सरकारी नियमों के कारण सरकार को दे चुके है। क्योंकि एक समय ऐसा था जब हमारा देश 100 प्रतिशत कृषि पर आधारित था लेकिन निरन्तर बदलती सोच और हावी होती आधुनिकता ने लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया और फिर वहां भी कुछ नहीं मिला। पता अब चला कि इन सब सुख सुविधाओं के बावजूद भी खाद्यान्न तो जरूरी है लेकिन ये समझ आते-आते देर हो चुकी है एवं खाद्यान्न महंगे हो चुके है।
अब यदि देश को कृषि प्रधान देश बना दिया जाए तो हमारी मूलभुत आवश्यकताएं (रोटी कपड़ा और मकान) पूरी हो जाएगी लेकिन तब यह हो-हल्ला मचाने की जरूरत न पड़े कि देखों कि उस देश के लोग तो ऐसा खाते है, ऐसा पहनते है व ऐसे मकानों में रहते है। हां हमें हमारी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति जरूर हो जाएगी। पेट भर जाएगा पेटी नहीं भरेगी।