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Monday, November 1, 2010

Dr. Deepak Dwivedi Poem

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मंगुराम की दिवाली
- डॉ. दीपक द्विवेदी
जब कागज की कश्ती टूट गयी
डोर पतंग की छूट गयी
मन करता था कुछ पाने को
अम्मा तरसती थी आने को
ऐसे में दादी बम पटाखे लायी
मंगू की बांछे खिल आयी
जब बड़ा हुआ तब संगी साथी
सारे के सारे इतराते थे
पेन्ट है तुम्हारी फटी हुयी
रह रहकर चिढ़ाते थे
त्यौहारों के जब दिन आए
सूट बुट से मन ललचाए
ऐसे में नानी ढेर सारे कपड़े लायी
मंगू की बांधे खिल आयी
चढ़ी जवानी जब मांगू की
मन में सतरंगी सपने थे
जी भर कर है की पढ़ाई
अब कुछ बनने की बारी आयी
इम्तिहान दर इम्तिहान दिए
सारी सारी रातें जागा
अपने-अपने का इन्टरव्यू
ये है कैसा चक्रव्युह
बात कुछ समझ नहीं आयी
किस किसको समझाएं भाई
आत्मविश्वास कभी ना खोना
अपने गुरु ने सिखलाया था
बस यही एक महामंत्र
उस दिन काम आया था
सरकारी खजाने का पहला पैसा
हाथ उसके जब आया था
माँ की ममता माँ का दुलार
माँ का आंचल, माँ का प्यार
बस याद यही रह पाया था
सारी नोटें, सारा जीवन
बस तुम पे कुर्बान है
है माँ तू महान है।
जीवन के अगले पड़ाव पर
पांव रखने की तैयारी थी
मन ललचा रहा था फल खाने
लड्डू की तैयारी थी
काजल, टीका, बिन्दी, चुड़ी
पायल की खनक मतवाली थी
मणियारी संग मांगु ने कदम जब पहला रखा
मानो कान्हा को राधा मिल गई
मानो चातक की प्यास बुझ गई
खुशियां आ गई मांगु के द्वार
छीपावली मनायी जम के इस बार।
- डॉ. दीपक द्विवेदी
09460908988

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