कलम आज उनकी जय बोल
- डॉ. निर्मला शर्मा
जी हाँ कलम अपने आप में तो धन्य होती ही है, किन्तु तब वह और भी धन्य हो उठती है, जब वह स्वनाम धन्यों की जय बोलती है। तब न केवल कलम बल्कि, कलमकार भी धन्य हो उठता है। अब वह समय कहाँ जब खलील मिया फाख्ताएँ उड़ाया करते थे। आज के दौर में कोई भी काम बेमकसद नहीं किया जाता, तो भला कलम ही बेवजह क्यों चले। वह जयकारे लगाए तो भी मकसद, कटार बन हृदय में भुँक जाए तो भी मकसद या फिर साँप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे, सभी मकसदों को लेकर धड़ाधड़ चलती है कलम।
‘‘कवित विवेक एक नहीं मोरे, सत्य कहहुँ लिखि कागद कोरे’’ की सादगी, विनम्रता और भलमनसाहत तुलसी के युग में ही होती होगी जिसने उत्तर भारत के मेरुदंड ‘मानस’ की रचना कर भी अपनी कलम की ताकत को नहीं पहचाना। आज का कलमकार कलम की ताकत को भरपूर पहचानता है और उसकी कीमत वसूलना भी बखूबी जानता है। ऐसे ही एक कलमकार को मैं भी जानती हूँ। मंत्रीजी की यात्राएँ हांे या संतांे-महंतों की धर्म सभाएँ, उनकी उपस्थिति अनिवार्यतः रहती है। अपने समग्र संचित ज्ञान का सदुपयोग वे नेताजी के संबोधनों और संत-महंतों के उद्बोधनों को महिमामंडित करने में करते हैं। अनुयायियों, श्रद्धालुओं और भक्तों के जयकारे तो हवा में खो कर रह जाते हैं पर उनकी जयकार कलमबंद बयान के रूप में सूर्य की पहली किरण के साथ अखबारों की सुर्खियों में जगमगाती, आराध्य को चाय की चुस्कियों के साथ रोमांचित, आह्लादित कर जाती है और कलम की अदा पर फिदा हो जाता है उसका दिल। ‘‘पुत्र! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो’’ आपकी प्रसन्नता ही मेरे लिए वरदान है श्रीमन् - अब और क्या माँगू?’’ भक्त की इस सादगी पर और भी रीझ उठते हैं कलयुगी भगवान और परंपराओं का मान रखते हुए केकैयी के तीन वरदानों की तरह उनका वर भी किसी विशेष अवसर के लिए सुरक्षित हो जाता है। युग बदला, मूल्य बदले पर कुछ बातें यथावत ही रहीं। आज भी ऐसे वरदानों का उपयोग किसी भरत को पदासीन और किसी राम को निष्कासित कराने के लिए वैसे ही किया जा रहा है।
राजनीति पर संतों का बढ़ता प्रभाव उन्हें और भी महत्त्वपूर्ण बना रहा हैं। गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूँ पॉय, की समस्या का निदान तो कबीर ने पहले ही कर रखा है। और फिर कलयुगी आराध्य स्वयं जिसकी चरण वन्दना कर इन्द्रासन पाने का आशीष चाहते हों, कलमकार उनकी प्रशस्ति में भला कैसे पीछे रह सकता है। संतों गुरुओं की आपसी प्रतिस्पर्धा में भी मीडिया की अहम् भूमिका होती है। यही वह अखाड़ा है जहाँ कलमकार अपनी कलम की ताकत दिखाता, पूज्य गुरु के प्रतिस्पर्धी को पटखनी दे अपना लोहा मनवाता और गुरु का अनन्य बन जाता है। फिर उसकी पौ बारह होते देर कहाँ लगती है। ऋद्धि-सिद्धि अपने आप खिंची चली आती है।
जरूरी नहीं कि कलम की ताकत हमेशा प्रत्यक्षतः प्रकट हो कर ही प्रदर्शित की जाए। जब श्रेय लेना हो, कृपा भाजन बनना हो या फिर पांडित्य का प्रदर्शन करना हो तो प्रकट हो जाओ, और जब एक तीर से दो शिकार करने हों, किसी से दुश्मनी निकालनी हो या फिर किसी की ऐसी-तैसी करनी हो तो ढूँढ़ लो किसी सीधे सरल डेस्क इन्चार्ज, संवाददाता को और थमा दो दनदनाता आग उगलता रुक्का। गोली आपकी कन्धा उसका। बिना मेहनत के हाथ लगी सनसनी कौन छोड़ता है भला? अपनी इस अप्रत्याशित उपलब्धि पर वह ठीक से खुश भी नहीं हो पाता कि पता चलता है कि अपनी नौकरी से हाथ धो बैठा है, वह बेचारा। सम्हले-सम्हले कि बहुत देर हो चुकी होती है।
पर कलमकार पर कोई आँच नहीं आती, साँप भी मर जाता है और लाठी भी सलामत किसी और प्रहार के लिए। क्यों कि उसकी कोई प्रतिबद्धता नहीं होती। न किसी संस्था के प्रति, न किसी पद या किसी व्यक्ति के प्रति, वह सर्वतंत्र स्वतंत्र होता है। और अपनी स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग करता है। तलाशती रहती है उसकी गिद्ध दृष्टि उस मुर्गे को जो दाना चुगना स्वीकार कर लेता है बिना यह जाने कि दाना उसके हलाल होने की कीमत है।
इस तरह कलमकार केवल कलमकार नहीं होता, वह राजनीति के दाँव-पेंच और फन से पूरी तरह वाकिफ होता है और सारे काम अपने आकाओं से दो कदम आगे बढ़कर करता है। क्यों कि आकाओं पर तो जनता की नज़र होती है, विरोधी दल की नज़र होती है और सबसे पैनी-नज़र होती है मीडिया की। पर कलमकार तो इन्द्रजालिक होता है, सम्मोहन-वशीकरण, मारण और उच्चाटन सभी विधाओं का ज्ञाता। मिस्टर इंडिया की तर्ज पर अन्तर्धान होकर भी बड़े-बड़े करतब दिखाता है और उसकी जगह पिटता है कोई और बेचारा नज़र आने वाला।
अस्तु मेरी प्रिय कलम। तुझे यदि किसी की जय बोलनी ही पड़ी तो सबसे पहले ऐसे स्वनामधन्य कलमकारों की जय अवश्य बोलना।
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(डॉ. निर्मला शर्मा)
गंधमादन,
9-ए, माही सरोवर नगर,
बाँसवाड़ा (राजस्थान)
327001
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