वर्तमान की कर्म व्यवस्था में कोई शिक्षक बनता है तो कोई पटवारी, कोई ग्राम सेवक, कोई चिकित्सक, कोई कलेक्टर, कोई इंजीनियर, कोई डाॅक्टर तो कोई कुछ बनता है। यह बनने के लिए उस व्यक्ति को उस कार्य का ज्ञाता होना आवश्यक है। कोई चिकित्सक किसी कलेक्टर का कार्य नहीं कर सकता है। अपवाद हो सकता है कि कोई दो कार्यों को संपादित करने में समान प्रतिभा रखता हो लेकिन उसकी प्रामाणिक योग्यता जिस पद के लिए होगा तथा वर्तमान शासन व्यवस्था के नियमों में जिस पद पर स्थापित होगा वह वही कहलाएगा। एक उदाहरण देना यहां लाजमी समझता हूं कि विगत दिनों बांसवाड़ा में डाॅक्टर्स की हड़ताल के दौरान बांसवाड़ा एसडीएम ने चिकित्सा व्यवस्थाओं को अपने हाथ में लिया था यह उनकी दोहरी प्रतिभा का प्रमाण है परन्तु वे कहे तो एसडीएम ही जाएंगे। बस यही बातें वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था पर भी लागू होती है।
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