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Monday, May 7, 2018

विचार शृंखला = शरीर मर्यादा


शौचादि से निवृत्ति के पश्चात जब तक मैं अपना बायां हाथा मांज नहीं लेता तब तक उस हाथ से कोई काम नहीं करता। उसके बाद भी भोजन करने या पूजाआदि शूचिता युक्त कार्य संपादित करने में बायां हाथ काम में लेने में मन गवाही नहीं भरता लेकिन मेरा बायां हाथ हर अच्छे, बुरे कार्य में मेरे शरीर का साथ देता ही है। मेरे बायें हाथ को चोट लगे तो उसके घाव पर दायें हाथ से ही मरहम लगता हूं। अधिक दर्द होने पर मेरी आँखों में आंसू भी आते है। मुख दर्द के मारे पुकारकर इस और ध्यान आकर्षित करता है। मैं उसकी दवाई करवाता ही हूं। जब शरीर पर वस्त्र धारण करता हूं तो भी बायें हाथ को पूरी तरह ढकता हूं चाहे कोई भी मौसम हो बायें हाथ को उस मौसम अनुसार वस्त्र पहनाता हूं। मेरा बायां हाथा भी अपना कार्य पूरी निष्ठा से करता है। शरीर के सभी अंगों की भांति मेरा बायां हाथ मेरे शरीर का महत्त्वपूर्ण अंग है। यदि किसी दिन मेरा बायां हाथ मेरे शरीर से कटकर अलग हो जाएगा तो मुझे जो नारकीय जीवन जीना पड़ेगा उसकी कल्पना भी मुझसे नहीं हो पा रही।

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